ऐसे बदलती है सूरत!

5-6 वर्ष पहले एक रिपोर्ट पढी थी. भारत के सर्वाधिक प्रदुषित शहरों की सूचि में अहमदाबाद का नाम दूसरे नम्बर पर था. दुख हुआ था.

5 साल बाद अब एक बार फिर प्रदुषण संबंधित सूचि देखी. सबसे कम प्रदुषित शहरों में दूसरे नम्बर पर अहमदाबाद. जो पहले नम्बर पर है वह शहर इतना बड़ा नहीं है ना ही इतने कारखाने और वाहन ही हैं.

बदलाव आ सकता है, नियत हो तो! अहमदाबाद और विशेष रूप से जनमार्ग से संबंधित यह नया वीडियो देखें :

विकास

अरे, पेपर नहीं आया!

सुबह 6.30 को उठ जाता हूँ. फिर भूत की तरह टहलने लगता हूँ. इंतजार पेपर (पढें समाचार पत्र) का होता है. फेरिया आया कि नहीं. नहीं आएगा तो मुश्किल होगी. शौच के लिए कैसे जाया जाएगा.

बार बार दरवाजे तक जाता हूँ, फिर मायूस होकर लौट आता हूँ. एक आँख घड़ी पर होती है, समय तो बीत रहा है. एक बार लिफ्ट की आवाज़ आती है और मन प्रफुल्लित हो जाता है. फेरिया आ गया अब तो. पर हाय, लिफ्ट तो बीच में ही रूक गई और कोई साहब दूध लेकर अपने घर चले गए. फेरिया नहीं आया.

अब नहीं रूका जाएगा. तो पुराना कोई अखबार उठाकर काम चलाने के लिए शौच में घुस जाता हूँ. अनमने ढंग से थोड़ी देर में वापस लौटता हूँ. 7 बजे गए. फेरिया नहीं आया. क्या हुआ होगा?

दरवाजा खोलता हूँ. नही, पेपर नहीं है. मेरा भतिजा मुझसे कहता है - तो खरीद कर ले आओ. मै कहता हूँ, नहीं आ जाएगा. होती है देर कभी कभी.

लेकिन फिर देर तो बढती ही जा रही है. 7.45 हो गए. आज तो चाय भी नहीं भाई. फिर से दरवाजे पर देखा. पेपर नहीं है. सामने वाले पड़ोसी बैचेन आत्मा की तरह घूम रहे हैं. मुझे देखते ही बताते हैं, पेपर नहीं आया.

जानते हैं भाई नहीं आया, देख तो लो, मैं भी तो घूम ही रहा हूँ.

8.15 हो गए, 8.30 हो गए. अब कोई उम्मीद नहीं. अब नहाने जाओ. नाश्ता करो. ऑफिस के लिए तैयार हो जाओ. 9 बज गए. अब तो नहीं ही आएगा. मन में कैसे कैसे विचार आ रहे हैं. रोज तो 6.15 को आ जाता है. क्या हुआ होगा? बिमार होगा, कहीं एक्सीडेंट तो नहीं हो गया. हे भगवान.

ऑफिस के लिए निकलता हूँ. दरवाजा खोलता हूँ.

पेपर का बंडल पड़ा है. बता नहीं सकता कितनी खुशी मिलती है. बड़े चाव से उठाता हूँ कि पत्नी की आवाज आती है - ऑफिस ऑफिस.

[मेरा घर पढाकु है. घर में 3 पेपर आते हैं. रविवार को 4 भी हो जाते हैं. सोचिए इतने समाचार चैनल है, इंटरनेट है लेकिन "पेपर" तो पेपर है]

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एक ही लोग, पर दो व्यवहार, कैसे?

भारत हो और गंदगी ना हो ऐसा हो नहीं सकता. हमारे धार्मिक स्थानों से लेकर सार्वजनिक वाहनों, सड़कों, गलियों और मौहल्लों हर जगह गंदगी के ढेर दिखाई दे जाते हैं. नदियाँ नालियाँ बनी हुई है, और हम ऐसे ही जीने के अभ्यस्त हैं.

लोगों का व्यवहार ही ऐसा हो गया है कि वह कुड़ेदान के पास कचरे का पहाड़ बनाता है और कुड़ादान खाली होता है. इसलिए तब आश्चर्य होता है जब यही लोग कभी कभी अपवाद की मिसाल पेश कर देते हैं.

कम से कम 3 स्थान ऐसे देखें मैनें जो मुझे आश्चर्यचकित करते हैं.

दिल्ली मेट्रो में कई बार सफर किया है. दिल्ली मेट्रो की तो अपनी विशेषता है ही परंतु उसमें सफर करने वाले दिल्लीवासियों की तारीफ करनी चाहिए कि मेट्रो में गंदगी नहीं दिखाई देती. मेट्रो को शुरू हुए एक दशक होने वाला है लेकिन मेट्रो अभी भी लगभग ज्यों की त्यों बनी हुई है, यह उल्लेखनीय बात है.

लेकिन मेट्रो स्टेशन से बाहर आते ही स्थिति पलट जाती है. आप कश्मीरी गेट, झिलमिल, वेलकम और दिलशाद गार्डन स्टेशन से बाहर आएंगे तो सड़क पर गुटखों के पैकेटों और पीक की बरसात देखेगे.

दूसरा उदाहरण – अहमदाबाद की कांकरिया झील. अहमदाबाद की सीमाचिह्न रूपी इस झील के नए अवतार को आम जनता के लिए खुले एक साल हो गया है लेकिन यह लेकफ्रंड अभी भी नया नवेला है. एक कागज़ का टुकड़ा भी नहीं दिखता उधर, चाहे लाखों लोग अब तक यहाँ आकर चले गए हों.

तीसरा उदाहरणअहमदाबाद जनमार्ग बीआरटी. इसको शुरू हुए 3 महिने [ट्रायल रन 8 महिने] हो चुके हैं लेकिन यह भी अभी तक साफ सुथरी बनी हुई है.

लेकिन बाहर आने पर स्थिति पलट जाती है. विशेष रूप से कांकरिया झील से बाहर आने पर उसके कुछ दरवाजों के आगे पीक और गुटखे के पैकेट दिख जाते हैं.

तो ऐसा क्यों है यह समझ नहीं आता. लोग तो वही हैं. वही लोग मेट्रो और बीआरटी में सफर करते हैं. वही लोग साफ सफाई रखते हैं. और वही लोग बाहर आकर सबसे पहला काम पीक थूकने का करते हैं. दो व्यवहार कैसे? और क्यों नहीं यही व्यवहार कायम रखा जाए?

आचार व्यवहार, विकास, समाज

आइए करें गुमशुदा ब्लॉगरों की तलाश

मैं हिन्दी ब्लॉग से काफी समय से जुड़ा हुआ हूँ, इसलिए कई पुरानें ब्लॉगरों को जानता हूँ. आजकल ब्लॉग लिखना काफी कम हो गया है, पढना तो ना के बराबर हो गया है, परंतु कभी घंटों हिन्दी ब्लॉगजगत में खपाया करता था.

कल ऐसे ही बात करते करते बात निकली कि कुछ हिन्दी ब्लॉगर कैसे “गायब” हो गए! तो सोचा कि चलों उन्हें ढूंढा जाए, कुशल मंगल जानी जाए. आप भी मदद करिए. मेरी सूची तो छोटी होगी [क्योंकि अब हिन्दी ब्लॉग से कट सा गया हूँ] लेकिन जो लोग नियमित हैं वे सूची को बढाएँ.

गुमशुदा ब्लॉगर:

  1. गिरीराज जोशी: नोखा से हैं. काफी दिनो से गायब हैं.
  2. सागर नाहर: हैदराबाद से हैं. इनसे आत्मीय संबंध है. इन दिनो चैट और ईमेल संदेश का जवाब भी नहीं दे रहे.
  3. एक काफी युवा ब्लॉगर था. कोई “मेहरा” नाम याद नही आ रहा है.
  4. सुब्रह्मणियम: इनका घर मेरे घर के पास है. कल मैं और संजय भाई कुशल मंगल पूछने गए थे. पता चला कि वे मुम्बई में हैं.

ऐसे ही कई और ब्लॉगर हैं और होंगे. इन्हें खोजने के लिए मैने एक गूगल समूह बनाया है. इसके सदस्य बनिए और खोज अभियान में साथ दीजिए.

समाज

जनमार्ग “श्रेष्ठ” मार्ग

अहमदाबाद जनमार्ग बीआरटी को केन्द्रीय सरकार ने सर्वश्रेष्ठ नागरिक परिवहन सिस्टम माना है. इस पुरस्कार की दौड़ में दिल्ली मेट्रो भी थी. हालाँकि दिल्ली मेट्रो की अपनी विशेषता है और महत्व भी है. परंतु बीआरटी मेट्रो की अपेक्षा कहीं अधिक सस्ती होती है.

जब देश के अन्य महानगर मेट्रो के पीछे दीवाने हो रहे थे, तब गुजरात में बीआरटी को प्राथमिकता दी गई और उसके फलस्वरूप जनमार्ग का निर्माण जारी है. अब गुजरात के दो और शहरों सूरत और राजकोट में भी बीआरटी व्यवस्था तैयार की जा रही है.

अहमदाबाद बीआरटी ने कई नई पहल की थी और इसे मात्र एक सामान्य बस सिस्टम से कहीं अधिक महत्व दिया. शायद इसलिए जहाँ पूणे बीआरटी और दिल्ली बीआरटी असफल रही वहीं अहमदाबाद बीआरटी सफल.

कोई आश्चर्य नहीं कि अब अन्य शहरों [विदेशी शहर भी] के प्रतिनिधि जनमार्ग का अध्ययन करने आ रहे हैं.

जनमार्ग के अभी कई “फेस” बनने बाकी हैं और अहमदाबाद - गांधीनगर मेट्रोलिंक एक्सप्रेस पर भी काम शुरू होना है. यानी भविष्य अच्छा है.

कुछ “और” तस्वीरें जनमार्ग की.

बीआरटी

बीआरटी

बीआरटी

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विकास

“बोरोप्लस” निकली “वोलिनी”

कल रात में थोडी देर से शयनकक्ष में गया. मूहँ धोया, फिर अंधेरे में ही क्रीम टटोलने लगा. मेरे हाथ में ट्यूब आई. मैनें समझा बोरोप्लस है…

हथेली पर अच्छी तरह से मल कर चेहरे पर पोत ली और हाय रे… वह तो दर्दनिवारक “वोलिनी” मलम निकली. आँखे जल गई, होठ तिलमिला गए. मेरी हालत मत पूछो!

[माइक्रोपोस्ट मेरे ट्विटर चक चक से]

माइक्रोपोस्ट

कम बेबी, आओ सफाई करें, फोटू आएगी

अमीर होने लग जाते हैं या अमीर होना पड़ने लग जाता है तब कई चीजें फैशनेबल हो जाती हैं. इसे कॉस्मेटिक जीवन कहते हैं. जैसे कि गोल्फ खेलना, काँटे - चाकू से खाना खाना [पिज्जा भी!!!], अंग्रेजी में ही बतियाना [चाहे घटिया सा अनुवाद ही हो पाए] और हाँ “सोसाइटी” के लिए कुछ करना!

ऐसे ही कुछ “अमीरों” से कल सुबह मिला! वहाँ जो देखा उसे देख कर मन कोफ्त से भर गया. क्या ‘कोस्मेटिक” जीवन है, और क्या “छलावा’ है जिसमें हम जीते जा रहे हैं.

अहमदाबाद से प्रकाशित टाइम्स समूह के टेब्लोइड “अहमदाबाद मिरर’ महिनों से एक अभियान चला रहा है. अभियान है ‘शहर को स्वच्छ रखने के लिए योगदान देना”. इस योगदान के तहत आता है पूर्व निर्धारित जगह पर रविवार सुबह पहुँचना - महानगरपालिका द्वारा उपलब्ध करवाए गए झाड़ु, सुपड़ी [कचरा उठाने के लिए], डिब्बे आदि लेना और जुट जाना झाड़ु लगाने. अभियान बढिया है, इसमें दो राय नहीं. मैं स्वयं दो-तीन बार शामिल हो चुका हूँ. पहले पहल जब यह अभियान शुरू हुआ था तब 30-40 लोग आ जाते थे, अब इतने नहीं आते [बोरिंग हो गया ना... कुछ नया करो सोसाइटी के लिए].

खैर कल सुबह गया तो देखा 5-6 लोग ही हैं. AM के पत्रकार को भी अपनी ड्यूटी येन केन प्रकारेण खत्म करनी थी तो उसने कहा चलो जितने लोग हैं शुरू हो जाते हैं. तो हम शुरू हो गए. स्थान था मेरे घर के पास स्थित वस्त्रापुर झील. तो हम झील के आसपास सफाई करने लगे.

अभी तो झाड़ु को एक ही बार घुमाया था कि छायाकार आ गया… चलो चलो ग्रुप फोटो, और बस लोगबाग झाडु-कटका छोड फोटो खींचवाने भागे चले आए. ग्रुप फोटो खींचा गया. हमने सोचा अब झाड़ु लगाते हैं कि छायाकार ने कहा जरा घूम के झाडु लगाएँ.. मैं समझ पाता इससे पहले “क्लिक”. ठीक है भई… अब मैने थोड़ा झाडु लगाया और नीचे गीरे पानी के पाउच उठा ही रहा था कि लगा कुछ चमका है…. “क्लिक”.

अब कुछ और लोग भी आ गए. “मोर्निंग वॉक” करके लौटे ही होंगे. एक ‘लेडी’ भी आ गई जो अपने साथ बेहद कम उम्र की 4-5 “बेबीज़” लाई थी. पूरे समय वह बखान कर रही थी कि “बेबीज़” को समाजसेवा का तो “जबरा शौख” है. क्लिक… क्लिक… क्लिक….

पत्रकार कभी कहता यहाँ सफाई करो.. कभी वहाँ करो… कभी पता नहीं कहाँ करो... तभी एक बंदे ने कहा… उधर “ग्रीनरी” है. एक दूसरे पत्रकार ने तीसरे से धीरे से कहा फोटो उधर अच्छी आएगी. तो सब चले उधर. बीच में सीढियाँ आ गई तो छायाकार को सही ‘प्रोप’ मिल गया. आ जाओ.. आ जाओ… ग्रुप फोटो हो जाए. ठीक है भाई आ गए! क्लिक क्लिक….

इस बीच काफी समय लोगों का साक्षात्कार लेने में भी बीता. मेरा भी लिया गया. मैने भी “ज्ञान” झाड़ा [मौका कौन चूकता है!], कई अन्य लोगों ने भी “ज्ञान” की गंगा बहाई.

अब ग्रीनरी की बारी. हम पाउच उठाने में व्यस्त, तभी एक “रिटायर्ड” अंकल आ गए, जो हाथों में भी दस्ताने पहन कर आए थे… “सो डर्टी यू नो..” “या, आई नो”.. “दीज़ फिल्दी पीपल्स… उफ!’

पत्रकार उबने लगा अब, ‘ओके गायज़… वे डु दिस मच नाउ.. दिज़ इरिया… देन वी कॉल इट फोर डे…” मैं मुस्कुराया, ठीक है भाई, जैसा आप कहें. वैसे आधा समय तो फोटो एंगल सेट करने में ही बीता है…

तभी ‘मम्मीज़’ ने कहा कि “बेबीज़” को कल बुखार था, फिर भी आई.. पत्रकार का दिल पसीजा होगा, शायद. उसने अपने छायाकार से कहा बेबी की फोटो लो… और फोटो ली भी गई. छायाकार ने बेबी से कहा जरा वह पाउच उठा लो… हाँ बस.. थोड़ा ऊपर.. थोड़ा नीचे… ओके… क्लिक क्लिक…

और बस हो गया! क्या साफ हुआ पता नहीं! क्या मतलब निकलेगा वो भी पता नहीं! लेकिन टेब्लोइड के दो पन्ने जरूर भर गए. फोटो टेब्लोइड के पन्ने पर है, खुश हूँ? नहीं. परंतु “मम्मीज़” खुश होगी शायद.

कॉस्मेटिक “सेवा” कर ली गई. मैं भी शामिल था!

कोरी बकवास

25+ हो गए “शानदार 7″

तरकश के पाठकों को कुछ नया और रोचक परोसने के लिए हमने 13 जुलाई 2009 से एक नया विभाग “शानदार 7” शुरू किया था. इस विभाग में हम विभिन्न वस्तुओं, घटनाओं, बातों से संबंधित 7 उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.

3 महीने में ही इस विभाग में लेखों की संख्या 25 के पार जा चुकी है.

जैसा की हमने सोचा था अब यह विभाग तरकश का सबसे लोकप्रिय विभाग है. यदि आपने इनमें से कुछ लेख ना देखें हो तो यह रही सूची:

7 भविष्याणियाँ पृथ्वी के विनाश की, जो गलत साबित हुई
7 प्रभावशाली महिलाएँ, जिन्होनें दुनिया को दिशा दी
7 विचित्र नाम सेलिब्रिटी बच्चों के
7 शानदार और आसान अप्लिकेशनें फोटो एडिटिंग के लिए
7 बड़ी परंतु अनजानी दुर्घटनाएँ / विनाशलीलाएँ
7 अद्भूत लैपटॉप
7 गुप्त शक्तियाँ जानवरों की जो शायद आप ना जानते हों
7 विवादास्पद ‘नोबेल पुरस्कार”
7 “सबसे लम्बी” विस्मयकारी घटनाएँ / बातें
7 महान कलाकृतियाँ और स्थापत्य जो अधुरे रह गए
7 अनोखी जेल जिनके बारे में आप जरूर जानना चाहेंगे
7 बेहतरीन ‘हरे” विज्ञापन, पर्यावरण की रक्षा हेतु
7 ऑडियो सर्च इंजिन जिनके बारे में शायद आप ना जानते हों
7 मज़ेदार तरीके और उदाहरण गाड़ियों को नाम देने के
7 चिकित्सा क्षैत्र की “प्रथम’ बातें
7 विचित्र पेड़ पौधे – जिनके बारे में शायद आप ना जानते हों
7 विचित्र एलर्जी जो जीना दूभर कर सकती है
7 अनोखे कीर्तिमान जो भीड़ ने बनाए
7 सफलताएँ भारत की जिन पर हमें गर्व है
7 असफलताएँ भारत की जिन पर हमें दुख है
7 फिल्मी रूप राष्ट्रपिता के!
7 बातें शरीर की जो शायद आप ना जानते हों
7 जानी-अनजानी बातें स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी अरिहंत के बारे में
7 ऐसे विलुप्त हो चुके जानवर जिनकी वास्तविक तस्वीरें उपलब्ध है
7 लोकप्रिय तकनीकें और गैजेट जो अब मृत्युशैया पर हैं
तरकश

दो नियम क्यों? पाटिल वापस तो देशमुख क्यों नहीं

महाराष्ट्र की जनता के भुतपूर्व गृहमंत्री अब फिर से वर्तमान हो गए हैं. श्री आर.आर. पाटिल की बतौर गृहमंत्री वापसी हुई है और इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनकी वापसी उस महिने में हो रही जिस महिने देश के ऊपर हमला हुआ था.

26/11 ने देश को घायल किया, शर्मसार किया और कलंकित भी किया और पाटिल साहब को रवाना भी किया. लेकिन वे अकेले नही गए, साथ में मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख भी गए और गृहमंत्री शिवराज पाटिल भी.

लेकिन आज लगभग एक वर्ष बाद पाटिल साहब लौट आए हैं. लेकिन देशमुखजी चाहते हुए भी दिल्ली से लौट ना सके. क्या उनको भी उनकी पसंदीदा कुर्सी नहीं दे देनी चाहिए. आखिर छोड़ने की वजह तो एक ही थी. और कुछ बदला भी नहीं है. लोग भी वही हैं सरकार भी वही है.

राजनिति

सभी गूगल सुविधाएँ एक साथ देखें

वैसे जीमेल में आजकल कुछ लेब फीचर जोड़े गए हैं जिससे गूगल कैलेंडर, टास्क और डॉक्स आदि के गैजेट जीमेल के आवरण में दिखाई देते हैं, लेकिन वे भी गैजेट की तरह होते हैं और वहाँ दी गई कड़ी पर क्लिक करने से नए टेब या विंडो में वह साइट खुल जाती है.

लेकिन यदि आप फायरफोक्स प्रयोक्ता हैं तो एक एड-ऑन जोड़ सकते हैं. माइकल नामक एक तकनीकविद द्वारा तैयार इंटग्रेट जीमेल नामक यह एडऑन मुफ्त उपलब्ध है. इसे इंस्टाल करने के बाद आप जब जीमेल खोलेंगे तो पाएंगे कि आपने इनबॉक्स के नीचे गूगल रीडर और कैलेंडर जुड़ गए हैं.

यदि आप गूगल की अन्य सेवाओं को जोड़ना चाहें तो फायरफोक्स के टूल्स मेनु में जाकर एड-ऑन चुनें और सूची में से इंटग्रेट जीमेल चुनकर उसके ओपशंस में जाएँ.

इस एडऑन के माध्यम से आप एक ही स्क्रीन पर जीमेल, कैलेंडर, रीडर, गूगल वोइस, ग्रुप्स, नोटबुक, पिकासा, समाचार आदि सेवाएँ देख सकेंगे. सभी साइटें अपने अपने टेब में आती हैं. इसलिए आप किसी भी टेब को खोल या बंद कर सकते हैं.

इस एडऑन को देखकर लगता है कि गूगल को ऐसी सुविधा स्वयं ही उपलब्ध करवानी चाहिए थी.

[तरकश पर प्रकाशित लेख से साभार]

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